“विकलांगता के साथ जी रही आदिवासी महिलाएं न केवल पीड़ित हैं बल्कि हम जलवायु समाधान की कुंजी हैं”


मेरा नाम प्रतिमा गुरुंग है और पश्चिमी नेपाल के एक पहाड़ी क्षेत्र की एक विकलांग आदिवासी महिला के रूप में, मुझे अपने देश में जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का बहुत नज़दीकी, प्रत्यक्ष अनुभव है। नेपाल को दुनिया का चौथे सबसे ज्यादा जलवायु परिवर्तन संवेदनशील देश का स्थान दिया गया है, जहाँ 80% से अधिक आबादी भूकंप, सूखा, बाढ़, भूस्खलन, अत्यधिक तापमान, और ग्लेशियर झील के फटने से बाढ़ जैसे प्राकृतिक खतरों के जोखिम के खतरे में है । इन जलवायु प्रभावों में बढ़ोतरी होने के कारण, नेपाल के  लोगों के जीवन और आजीविकाओं को खतरा है, विशेष रूप से महिलाओं, आदिवासी लोगों और विकलांग लोगों के लिए ।

मैं एक कार्यकर्ता और राष्ट्रीय आदिवासी विकलांग महिला संघ नेपाल (NIDWAN नेपाल) की अध्यक्ष और विकलांगता के साथ जी रहे आदिवासियों के वैश्विक नेटवर्क की संचालन समिति की महासचिव भी हूं । NIDWAN द्वारा ” विकलांग महिलाओं पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव ” शीर्षक से किए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि महिलाएं और लड़कियां जलवायु संकट के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील हैं। हालाँकि, नेपाल की कृषि में उनके योगदान और पानी और जलाऊ लकड़ी जैसे प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधक के रूप में उनकी सहायक भूमिका को देखते हुए, आदिवासी महिलाओं और विकलांग महिलाओं के पास जलवायु संकट का सामना करने पर चर्चा में योगदान करने के लिए महत्वपूर्ण ज्ञान और प्रस्ताव हैं, लेकिन उन्हें इन निर्णयों से बाहर रखा गया है।

हमारे अध्ययन ने उजागर किया कि ज़मीनी स्तर पर जलवायु परिवर्तन वास्तविकताओं का सामना असल में आदिवासियों, विकलांग महिलाओं और उनके परिवारों को ही करना पड़ता है। नेपाल में अधिकांश आदिवासी लोग, जिनमें विकलांग महिलाएं भी शामिल हैं, किसान हैं और अभी-भी अपनी आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर हैं; वन और प्राकृतिक संसाधनों के साथ उनका सहजीवी संबंध है। वनों और जैव विविधता का सतत प्रबंधन उनकी विशिष्ट पहचान और प्रथाओं का अभिन्न अंग है, और एक ऐसी जीवनशैली है, जो वे अपनी आने वाली पीढ़ियों को देते हैं।

NIDWAN और अन्य द्वारा किए गए शोध से पता चलता है कि अधिकांश आदिवासी  लोग जो अपनी पुश्तैनी भूमि पर निवास कर रहे हैं, विकास के नाम पर विस्थापित किया जा रहा है – सरकार के नेतृत्व वाली नीतियों और परियोजनाओं जैसे कि जल विद्युत बांध, सड़कों के विस्तार और निष्कर्षण उद्योगों के कारण। उनके पास अब भूमि, जंगल और जल संसाधनों तक पहुंच नहीं है, जिसका सीधा असर उनके जीवन और आजीविका पर पड़ता है। सरकार आदिवासी लोगों की पारंपरिक प्रथाओं और आजीविका का समर्थन नहीं करती, जिससे कई आदिवासी लोगों को अपनी पारंपरिक जीवन शैली को त्यागने के लिए मजबूर होना पड़ता है।

इसके अलावा, लगातार जलवायु परिवर्तन से संबंधित सूखे और बाढ़ के कारण होने वाले स्थानीय कृषि को नुकसान से इसके नकारात्मक प्रभाव और बढ़ जाते हैं। ऊंचे पहाड़ों में, आलू और मंडुवे की कुछ प्रजातियों के बीज अब उपलब्ध नहीं हैं। जल संसाधन सूख गए हैं और कृषि भूमि बंजर हो गई है, भूमि की उत्पादकता कम हो रही है और आदिवासी लोगों और विकलांग लोगों के जीवन को सीधे प्रभावित कर रही है।

एक केस स्टडी में, काठमांडू के निकट एक जिले कवरे में मानसिक रूप से विकलांग एक आदिवासी लड़की की मां को अपनी बेटी को पौष्टिक भोजन और उसकी बेटी के स्वास्थ्य और स्वच्छता की जरूरतों के लिए आवश्यक पर्याप्त पानी उपलब्ध कराने में कठिनाई का सामना करना पड़ा। माँ को पानी ले कर घर लाने के लिए हर दिन दो घंटे की यात्रा करनी पड़ती है, और साथ ही वह डरी रहती है कि उसके घर पर न होने के समय कहीं उसकी बेटी को कुछ हो न जाये। पानी और वन संसाधनों तक पहुंच की कमी के कारण उसे पारंपरिक शराब बनाना और बेचना मुश्किल हो जाता है जिससे कि वह अपनी बेटी और परिवार का आर्थिक रूप से सहयोग कर सके।

ये सभी जलवायु परिवर्तन प्रभाव एक महिला, एक आदिवासी व्यक्ति के रूप में और एक विकलांग महिला के रूप में के रूप में मुझे और मेरे समुदायों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं। व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से विकलांग आदिवासी महिलाओं को समाज और निर्णय प्रक्रिया में भाग लेने के लिए पहुंच और व्यवहार संबंधी बाधाओं का सामना करना पड़ता है । क्योंकि हम अल्पसंख्यक जेंडर, क्षमता और जातीय पहचान रखते हैं, इसलिए हमें सांस्कृतिक मानदंडों, ऐतिहासिक उत्पीड़न, कानूनों और धर्म के कारण कई प्रकार के भेदभाव का सामना करना पड़ता है। इसके परिणामस्वरूप, अति-गरीबी में रहने वालों के बीच हमारी संख्या अधिक है और संसाधनों तक हमारी पहुंच और सार्थक तरीके से अपने अधिकारों का प्रयोग करने की क्षमता सीमित है।

हालांकि आदिवासी लोग पृथ्वी की जैव विविधता के 80% हिस्से की रक्षा करते हैं – और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील होने के बावजूद – जलवायु परिवर्तन चर्चाओं में हमारा उचित संख्या में प्रतिनिधित्व नहीं है, जिसमें नुकसान और क्षति, और अनुकूलन और शमन से संबंधित मुद्दे शामिल हैं। परिवर्तन के अभिकर्ता और एजेंट के रूप में महिलाओं, आदिवासी महिलाओं और विकलांग आदिवासी महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है । हम न केवल पीड़ित हैं बल्कि हम समाधान की कुंजी हैं, जिन्हें ठोस कार्यान्वयन के साथ जलवायु नीतियों और योजनाओं में साकार करने की आवश्यकता है। जलवायु न्याय पर काम करने वाले विभिन्न साझेदारों, जैसे की विभिन्न देश, संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों, विकास भागीदारों और सीएसओ को आदिवासी महिलाओं और विकलांग आदिवासी महिलाओं जैसे विविध पहचान वाले सामाजिक समूहों की आवाज़ सुननी चाहिए, जो अपने अधिकारों के लिए लड़ना और खड़े होना जानते हैं। इन साझेदारों को महत्वाकांक्षी महिलाओं को प्रोत्साहित करना चाहिए जो कभी भी महत्वपूर्ण मुद्दों से नज़र नहीं हटातीं।

मैं महिलाओं, आदिवासी महिलाओं और विशेष रूप से विकलांग महिलाओं को अधिक समर्थन देने का आग्रह करती हूं, जिन्हें सामुदायिक स्तर पर सामाजिक दर्जाबन्दी में निचले स्थान पर रखा जाता है। यह हमारी पृथ्वी को संरक्षित करने और उन्हें जलवायु चर्चाओं के केंद्र में रखने के लिए आदिवासी महिलाओं के ज्ञान, परंपराओं और योगदान का सम्मान, प्रचार और एहसास करने का समय है।

यह समय मौन तरीके से काम करने के तरीके पर पुनर्विचार करने का है और इसके बजाय हमें आंदोलनों में सहयोग करना चाहिए – चाहें वह जेंडर, विकलांगता, जातीय और अन्य अधिकारों की लड़ाई हो – प्रत्येक व्यक्ति की परतों वाली और अतिव्यापी पहचानों को स्वीकार करना। यह सहयोगी बनाने और एक स्थानीय से वैश्विक स्तर पर जुड़ने का और दीर्घकालिक वित्त पोषण प्रदान करने का समय है जो विकलांग महिलाओं जैसे सामाजिक समूहों के प्रस्तावों और जीवन के अनुभवों को ध्यान में रखता हो। हमें संरचनात्मक परिवर्तन के माध्यम से ऐतिहासिक भेदभाव को दूर करने के लिए एक अंतर्खण्डीय दृष्टिकोण के साथ काम करना चाहिए जो जेंडर, संस्कृति और विकलांगता को ध्यान में रखते हुए, शक्ति को स्थानांतरित करता हो ताकि जलवायु न्याय विमर्श सभी के लिए अधिक समावेशी बन सके। यदि सामूहिक रूप से, हम जलवायु संकट का सामना करने के लिए ये ज़रूरी और आवश्यक कदम उठा सकते हैं, तो हम यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि कोई भी पीछे न छूटे।

 

सुश्री. प्रतिमा गुरुंग नेपाल की एक प्रमुख शैक्षणिक कार्यकर्ता हैं। प्रतिमा ने आवाज़हीन महिलाओं, आदिवासी लोगों और विकलांग लोगों की आवाज़ उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, और नेपाल, एशिया और विश्व स्तर पर कई हाशिए की पहचानों को पाटने के लिए अंतरखंडीयता के दृष्टिकोण के साथ काम करती हैं। सुश्री. गुरुंग त्रिभुवन विश्वविद्यालय के पद्मकन्या कॉलेज में पढ़ाती हैं । वे शोध का काम करती हैं और अपने अकादमिक शोध को पैरवी से जोड़ती है । वह नेपाल सरकार में महिला, बच्चों और वरिष्ठ नागरिकों के मंत्रालय द्वारा गठित विकलांगता राष्ट्रीय निर्देशन समिति के विशेषज्ञ के रूप में भी योगदान देती हैं । प्रतिमा गुरुंग आदिवासी विकलांग वैश्विक नेटवर्क (IPWDGN) की संस्थापक सदस्य और  वर्तमान में IPWDGN और राष्ट्रीय आदिवासी विकलांग महिला संघ नेपाल (NIDWAN) महासचिव भी हैं। NIDWAN  जीएजीजीए की सहभागी संस्था भी है। उन्होंने नेपाल और एशिया में एक उदाहरण स्थापित किया है कि शुरुआत कैसे की जाए: क्रॉस-मूवमेंट सहयोग; महिलाओं,आदिवासी लोगों, विकलांग लोगों और अन्य हाशिए पर रहने वाले आंदोलनों के बीच एक अंतरखंडीता का दृष्टिकोण ; और समावेशी शिक्षा, पर्यावरण न्याय व अन्य मुद्दों पर एक विमर्श।  


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